संभल कर आईएगा! मेरी ज़िन्दगी में

मेरी ज़िन्दगी है रोशन इन काले अंधेरो से,
मेरी ज़िन्दगी में सोच समझ के आईएगा।

बंज़र ज़मीनों पर फूल नहीं खिला करते।
पौधा मुहब्बत का सोच समझ कर लगाईएगा।

गुलो से भी नाजुक है पाँव आपके,
इन कंटीली राहो को यूँ ही ना आजमाईएगा।

ग़म अपने छुपा के रखिए यह शहर है अंधे बहरो का,
किस को दिल की बात कहिऐगा किस को आंसू दिखाईएगा।

जान दे के भी हासिल नहीं है कुछ बाज़ार-ए-इश्क़् मे,
सौदा बहुत है मंहगा किजिएगा तो पछ्ताईएगा।

आप परेशान् होते है क्यो मेरे लिए क्यो खाँमखा,
सपना हुँ मै खुलते ही आँख भूल जाईएगा ............ ..!
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